ज़रदोज़ी वस्तुतः एक प्रकार की कढ़ाई होती है जो भारत एवं पाकिस्तान में बहुत ही प्रचलित है।ज़रदोज़ी का नाम फारसी से आया है, जिसका मतलब है सोने की कढ़ाई।
जरदोजी एक फारसी शब्द है जिसका संधी विच्छेद जर +दोजी यानी सोने की कढ़ाई। भारत में इसका काल ऋग्वेेेद माना जाता है और कहा जाता है की देवी-देवताओं को सजाने के लिए इस कला का उपयोग होता था हां बाद मेंं ये मुगल काल मे अकबर के शासन के दौरान प्रस्फुटित हुआ परन्तु औरंगजेब के कला के प्रति उदासीनता से कारीगर भारत के अन्य क्षेत्रों मे विस्थापित हो गए।कलाबातुन’ के नाम से जानी जाती इसकी मूल प्रक्रिया के अंतर्गत असली सोने या चांदी में लिपटे रेशम के धागों का उपयोग किया जाता था।
उपकरण
पहले चर्खे का सहारा ताग को सीधा करने तथा उसे ठीक से प्रयोग की सहूलियत में उपयोग किया जाता था।पुरातन चर्खा लकड़ी एवम बांस की पट्टी से बना होता था,पर आजकल ये साईकिल के पिछले चक्के के प्रयोग से होता है, चेन, तथा गीयर को भी चरखा बनाकर उससे चरखे का काम लिया जाता है। इसके पिछे का कारण वस्तुतः साईकिल के रिम का मजबूत होना है जिससे यह ज्यादा दिन तक चलता है, वहीं दूसरा प्रमुख कारण है, इसका पहिया चेन तथा गीयर से लगा होता है अतः यह लकड़ी वाले चर्खा की तुलना में ज्यादा गतिशील हो जाता है जिससे कम समय में ज्यादा से ज्यादा ताग लपेटा जाता है।
बनाने की प्रक्रिया
इसमें मुख्यतः चार प्रमुख चरण शामिल हैं
1.आकृति को एक अनुरेखण पत्र या ट्रेसिंग शीट पर खींचा जाता है, और इन आकृतियों के अनुरूप ही उसे छिद्रित कर दिया जाता है।
2 .उस ट्रेसिंग शीट को कपड़े पर रखा जाता है, और वह आकृति नीचे स्थित कपड़े पर स्थानांतरित करने के लिए उस पर मिट्टी के तेल और रॉबिन ब्ल्यू के घोल को थपथपाया जाता है।
3. कपड़े को एक लकड़ी या बांस के खांचे में फँसा कर रखा जाता है और इसे अच्छी तरह फैलाया जाता है ताकि हर पंक्ति और आकृति स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
4. अंतिम चरण में ‘एरी’ नामक लकड़ी की छड़ी से जुड़ी सुई जो धागे को कपड़ों के ऊपर और नीचे से गुजर सकती है, की मदद से इस काम को किया जाता है।
काम में आवश्यक बारीकी के आधार पर, कारीगर एक कपड़े को निपटाने के लिए 1 से 10 दिन तक ले सकते हैं।
पुराने समय में यह यह काम महिलाएं अपने घर में बैठकर हाथ से ही किया करतीं थीं लेकिन अब यह काम मशीनों के द्वारा भी किया जाता है।बहुत ही महीन रूप से इस कार्य को करने के लिये खुले स्थान पर एक लकड़ी का बना हुआ फ्रेम लगाया जाता हैं उसके बाद जिस कपड़े पर ज़री का कार्य किया जाना हैं उस कपड़े को टाँगा जाता हैं फिर उस पर एक विशेष प्रकार की सुई से ज़री की कढ़ाई की जाती है।
ज़री की कढ़ाई के लिये जहां पहले मुख्यत सोने एवं चांदी के धागों का प्रयोग किया जाता है।जो कि काफी महँगे होते हैं और आज जब सोने चांदी का दर मंहगाई के उच्चतम शिखर पर है तो उसकी जगह कृत्रिम धागों का प्रयोग आम हो चला है। यह कृत्रिम धागा चमकीला व पीले-सफ़ेद रंग का होता जो सोने व चाँदी के धागे जैसा लगता है। यह देखने में भी सुन्दर होता है एवं इन धागों के कारण ज़री के काम को करवाने की लागत भी कम आती है।
नीचे की साड़ी में भी पाढ़ और बार्डर में मखमल के ऊपर जरदोजी का काम है, जिसे भाई के तिलक में पहन खूब इठलाई थी।
बहुत ही सुंदर लेख विजया जी। ये साड़ियों वाले लेख बहुत शोधपरक और अलग हैं।
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