Saturday, 19 September 2020

रंग बनारसिया

मैं लगभग 5-6 वर्ष की थी,जब चाची के खुले पेटी से होते मेरी सरसराती नजर उस पिले बनारसी पर पड़ी थी। शायद इश्क का वो मयस्सर लव एट फर्स्ट साइट उसे ही कहते हैं।पीली हल्की बनारसी साड़ी।चाची की बियहुति साड़ी(वो साड़ी जो दूल्हे कर घर से दुल्हन के लिए आती है, और व्याह उसी साड़ी को पहना होती है।मुझे वो साड़ी बहुत पसंद थी,पर समय और देख रेख के अभाव से वो खराब हो गई थी और इस तरह एक टूटे दिल के साथ चल पड़ा था साड़ियों से इश्क का सिलसिला जो अब तलक जारी है।

जैसे आम फलों का राजा और गुलाब फूलों की रानी वैसे ही साड़ियों में कोई है तो वो बनारसी ही है, इसके क्या कहने।

रानियों से लेकर अभिनेत्रियों और हमारी पुरखों की औरतों से लेकर हम युवा पीढ़ी तक, कोई भी इसके जादू से अछूता नही है। 

रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग ज़री के डिजाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली विश्व प्रसिद्ध  सुंदर रेशमी साड़ी को ही बनारसी रेशमी साड़ी कहते हैं।

इनमें अनेक प्रकार के नमूने बनाये जाते हैं। इन्हें 'मोटिफ' कहते हैं।उन्ही में से कुछ प्रमुख परम्परागत मोटिफ हैं जो आज भी अपनी बनारसी पहचान बनाए हुए हैं।

 "बूटा" मोटिफ

जब बूटी की आकृति को बड़ा कर दिया जाता है तो इस बढ़ी हुई आकृति को बूटा कहा जाता है। छोटे बड़े पेड़-पौधे जिसके साथ छोटी-छोटी पत्तियाँ तथा फूल लगे हों इसी आकृति को बूटे से उभारा जाता है। यह पेड़ पौधे भी हो सकते हैं और कुछ फूल भी हो सकते हैं। गोल्ड, सिल्वर या रेशमी धागे या इनके मिश्रण से बूटा काढ़ा जाता है। रंगों का चयन डिज़ाइन तथा आवश्यकता के अनुसार किया जाता है। बूटा साड़ी के बॉर्डर, पल्लु तथा आंचल में काढ़ा जाता है।



 "बूटी" मोटिफ

बूटी छोटे-छोटे तस्वीरों की आकृति लिए हुए होता है। इसके अलग-अलग पैटर्न दो या तीन रंगो के धागे की सहायता से बनाये जाते हैं।इससे साड़ी की जमीन या मुख्य भाग को सुसज्जित किया जाता है। पहले रंग को 'हुनर का रंग ' कहा जाता है। जो सामान्यतः गोल्ड या सिल्वर धागे से बनाया जाता था हालाँकि आजकल इसके  महंगे होने के कारण गोल्ड और सिल्वर के धागे की जगह रेशमी धागों का भी प्रयोग किया जाता है।


"जाल" मोटिफ

बनारसी साड़ी का एक और प्रचलित मोटिफ है "जाल", नाम के अनुरूप ही जाल के आकृति लिए हुए होते हैं। जाल एक प्रकार का पैटर्न है, जिसके भीतर बूटी बनाई जाती है और इसे जाल- जंगला कहते हैं। जंगला डिज़ाइन प्राकृतिक तत्वों से काफी प्रभावित है। जिसमें समस्त फूल, पत्ते, जानवर, पक्षी इत्यादि बने होते हैं। 

बॉर्डर के तुरंत बाद जहाँ कपड़े का मुख्य भाग जिसे अंगना कहा जाता है की शुरुआत होती है वहाँ एक खास डिज़ाइन वस्त्र को और अधिक अलंकृत करने के लिए दिया जाता है, जिसे झालर कहा जाता है। 


यूँ तो यह सिल्क और गाढ़े कपड़े की वजह से ऋतुओं के अनुसार ये शीत ऋतु के लिए उपयुक्त है, पर अपनी राजसी ठाठ की वजह से इसकी उपयोगिता हर महत्वपूर्ण   रिवाज और हर ऋतु में है।चाहे वो यूपी,बिहार के किसी गाँव की हो या दक्षिणी प्रान्त की शायद ही कोई बधू होगी जिसका सुहाग पिटारा इससे सुशोभित न हो।

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