सन 2002,30 अप्रैल मेरी मुहबोली मौसी अपनी शादी में एक लाल साड़ी में बिल्कुल गुड़िया सी सजी धजी बैठी हुई।जाने ये उस माहौल का प्रभाव था या उस साड़ी का।साड़ी थी गुजरात की प्रसिद्ध घरचोला!
घरचोला मूलतः दो शब्दों से बना है, घर + चोला अर्थात घर मे पहने जाने वाला कपड़ा। इसका जो एक और अर्थ है वो वास्तव में काफी गूढ़ है, घरचोला यहाँ घर का अर्थ होता है दुल्हन का नया घर अर्थात उसका ससुराल और चोला यानी वहाँ से आने वाला शादी के लिए दुल्हन का कपड़ा।
घरचोला का मूल
घरचोला साड़ी का मूल गुजरात के खम्बात की खाड़ी से सम्बंधित है।16 वीं सदी के अंत तक खम्बात देश का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था और सम्पूर्ण विश्व के व्यापारी वहां से व्यवसाय करते थे,उन्ही में से कुछ थे सिल्क के उत्पादन वाले देश के और यही से कहानी शुरू हुई घरचोला साड़ियों के उत्पादन की।
घरचोला साड़ी के दो महत्वपूर्ण अंग है एक तो इसकी बुनाई दूसरी इसकी रंगाई।मूल रूप से इसकी रंगाई गुजरात के जामनगर में होती है,एक अवधारणा यह भी है कि घरचोला के मूल रंग लाल वहां के पानी से और सुर्ख खिलता है।
घरचोला का उत्पादन
घरचोला का उत्पादन मूल रूप से गुजरात के खम्बात में होती है खासकर इसकी रंगाई जामनगर में की जाती है।सूरत,राजकोट और सुरेन्द्र नगर जिले में भी इसका उत्पादन होता है। किंतु सौराष्ट्र और बाकी विभिन्न जिले में उत्पादित होने वाली घरचोला बाकियो से अलग होती है।
दक्षिण से पश्चिम का संगम
वस्तुतः ये एक भ्रांति ही है घरचोला साड़ी हमेशा शुद्ध सिल्क से ही बनता है।जबकि प्रमाणित रूप से शुद्ध घरचोला साड़ियों का निर्माण आंशिक रूप (यदाकदा) रूप से ही सिल्क पर होती है।मूल रूप से इसमें जो पटल प्रयोग में लाया जाता है वो होती है वेंकटागिरी सूती।जिसकी चमक और रूप कुछ सिल्क जैसा ही होता है।ये वेंकटागिरी सूती उत्पादित होता है गुजरात से सुदूर दक्षिणी भारत विशेषकर आंध्र प्रदेश में और इस तरह ये मापता है एक पूरी दूरी दक्षिण से पश्चिम की ओर।
जरी
घरचोला साड़ियों का मुख्य आकर्षण होता है उसमें प्रयोग होने वाली जरियां जो मुख्य रूप से सोने के धागों से बनी होती थी, अब उनकी जगह चांदियों के धागों का भी उपयोग होता है।चांदियो के मूल्य वर्धन से याब कॉपर और प्लास्टिक के जरी का भी उपयोग होने लगा है जो इन घरचोला साड़ियों को सस्ती और सुलभ बनाती हैं।
इन गोल्डन जरीयों को इस तरह से सूती या सिल्क के धागों के साथ बुना जाता है कि वो एक चौकोर ग्रिड डिजाइन में बुनते हैं।ग्रिड का हर बॉक्स चारो तरफ से एक जरी बॉर्डर सा बनता है,जो कि पतला या मोटा हो सकता है अपने डिज़ाइन के अनुरूप।
जरी के ये चौकौर ग्रिड अलग अलग पैटर्न में बने होते हैं जिनमे से प्रमुख होते हैं 9,12 और 52 स्क्वायर पैटर्न।इन पैटर्न के नाम पर ही इनका नामकरण भी होता है जैसे कि 12 स्क्वायर वाले को बार भाग और 52 स्क्वायर वाले को बावन भाग।
घरचोला के इन सारे चौकौर खाने को बंधेज के अलग अलग पैटर्न में रंगा जाता है अक्सर एक ही जैसे बंधेज हर खाने में उपयोग होता है या उनको स्ट्रेटेजिक तरीके से उपयोग में लाया जाता है।
रंग और मोटिफ
ज्यादातर घरचोला लाल या उसके आसपास के रंगों में ही बनते हैं क्योंकि गुजरात के हिंदुओं और जैनियों के बीच ही इस साड़ी का ज्यादा प्रयोग होता है जो इस रंग को काफी पवित्र मानते हैं।
दूसरा जो सबसे ज्यादा प्रयुक्त होने वाला रंग है वो है हरा! हरा रंग वंश की बढ़ोतरी का द्दौतक है।
तीसरा रंग पीला है जो खुद में बहुत पवित्र होता है।
घरचोला साड़ी को और भी सुंदर बनाया जाता है विभिन्न धागों की हस्तकारी से जिसमे कट डायमंड और गोटा पट्टी का भी इस्तेमाल होता है।चौकोर ग्रिड में हाथ से बनाये मोटिफ में साकार रूप लेते हैं भिन्न प्रकार की आकृतियां जैसे कि कमल,तोता,चिड़ियाँ,मोर,हाथी इत्यादि।वही पल्लू पर बने डिजाइन में प्रमुखता से उपयोग होता है।
फूलवारी - जिसके मोटिफ होते हैं,पेड़ पौधे और फूल।
शिकारी - जिसके मोटिफ में प्रयोग होते हैं,जंगल और शिकारी।
विजया शर्मा