Saturday, 12 March 2022

चंदेरी


इतिहास

 चंदेरी साड़ी का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना है माना जाता है कि करीब 20 हजार बुनकर मौलाना मजीबुद्दीन उलूफ के अनुयाई के रूप में बंगाल के लखनौती (ढाका) से, जिसे बुनाई का गढ़ माना जाता था, विस्थापित होकर चंदेरी आए थे। इन्होंने चन्देरी में बुनाई का काम शुरू किया। 

चंदेरी की साड़ियां राजा-महराजा के जमाने से परंपरागत रूप में चली आ रही हैं।सबसे पहले राजाओं के लिए सूत से पगडिंयां बनाया जाता था।बाद में उनकी रानियों के कहने पर सूत से साड़ीयां बनाई गई। फिर बाद में इसमें रेशम से काम शुरू हुआ। 

बुनाई

सिर्फ चन्देरी में बन सकती हैं दरअसल चंदेरी की खास जलवायु के कारण इस तरह की साड़ी का निर्माण सिर्फ वहीं हो सकता है, अन्यत्र नहीं।कहते हैं पहले सिर्फ सफेद साड़ीयां ही बनती थी बाद में यह अन्य रंगों में आने लगी।अब इन साड़ियों की रंगाई एवं बुनाई दोनो हीं चंदेरी में होती हैं।किंतु आज भी कच्चा माल जैसे कि रेशम एवं रंग बाहर से ही आते हैं।

चंदेरी साड़ी की खासियत उसे तैयार करने में है। यह पूरी तरह हैंडमेड होती हैं। इसे बनाने में पावरलूम यानी मशीनों का इस्‍तेमाल नहीं होता है। सालों पहले ट्रांसपेरेंट कॉटन या मलमल की साड़ी बनाई जाती थी। यह ट्रेंड आज भी बरकरार है लेकिन अब सिल्‍क के रेशमी धागों की चंदेरी साड़ी भी बनाई जाती है।फिलवक्त यह साड़ी प्‍योर सिल्‍क, प्‍योर कॉटन और कॉटन प्‍लस सिल्‍क जैसे फैब्रिक में बनती है।

मंहगाई

चंदेरी से साड़ियां बुनी जरूर जाती हैं लेकिन पूरा कच्चा माल बाहर से आता है। क्वाइल वाला रेशम चीन या जापान या कोरिया से आता है( पर जापान एवं कोरिया की सुत कच्ची होती है जो बाने पर कसने से टूट जाती है),जरी सूरत से आती है।बाना!जिससे बुनाई होती है वो कोयंबटूर या मुंबई से आता है। 

इसकी अधिक कीमत की एक और वजह यह है कि इसके निर्माण में धागे, कपड़ा इत्यादि ऑरिजिनल होते हैं। साथ ही, बुनाई सधे हाथ से बहुत ही बारीकी से की जाती है। एक साड़ी को तैयार करने में कई बुनकरों को कई दिन मेहनत करनी पड़ती है।

 इससे तैयार साड़ियां अपने विश्व स्तरीय पहचान बनाने में कामयाब रही। किंतु फिर भी वो सिर्फ राजघराने एवं धनाढ्य परिवारों तक हीं सीमित रहीं।बाद में मध्य प्रदेश सरकार ने चन्देरी साड़ियों को आमजन तक पहुंचाने की योजना बनाई। तब चन्देरी उत्पादों को सरकारी प्रोत्साहन मिला और इस साड़ी की कुछ डिजाइन आमजन तक पहुंच वाली भी बनने लगी
बुनकर

चंदेरी में दो तरह के बुनकर और कारोबारी हैं। पहले जो सिर्फ बुनकर जो अपने घरों में 2-3 हैंडलूम लगाते हैं। दूसरे हैं मास्टर बुनकर इन्हें मध्यम वर्ग का कारोबारी कह सकते हैं, इनके पास 50 से 100 हैंडलूप में हैं, इनके पास कई-कई लाख का माल स्टॉक रहता था, ये मांग पर साड़ियां बुनवाते 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार 33,081 जनसंख्या वाले चंदेरी में 6 हजार से अधिक हैण्डलूम लगे हैं, इन पर लगभग 15,000 लोग काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं। सरकार ने चंदेरी को बढ़ाने के लिए यहां हैंडलूम पार्क भी खोला है,जहां समूह बनाकर बुनाई होती है, हैंडलूम मार्क में लगभग 250 लूम लगे हैं, लेकिन ज्यादातर बंद ही हैं।

विशेष

कालांतर में चन्देरी में साड़ियों के अलावा दुपट्टे और सलवार सूट भी बनने लगे। कई फिल्मों एवं सीरियलों में भी चन्देरी साड़ियों और दुपट्टों का प्रयोग हुआ है।
कहते हैं पहले पहले फ़िल्म पकीजा, जिसमें मीनाकुमारी जी पर जो गाना फिल्माया गया था.....

" इन्ही लोगों ने लै लीना दुप्टटा मेरा......"

वो दुप्पटा चंदेरी का हीं था  


विजया।






Thursday, 18 February 2021

कांचीपुरम साड़ी

कांचीपुरम साड़ी या जनसामान्य में कांजीवरम साड़ी के नाम से जाने जानी वाली साड़ी भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर में बनाई जाती है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार कांचीपुरम साड़ी के बुनकरों को महर्षि मार्कण्डेय जी का वंशज माना गया है जो कमल के फूल के रेशों से देवताओं के लिए परिधान बुनते थे।

बुनाई

कांचीपुरम साड़ी की बनाई शुद्ध मलबरी सिल्क के धागों से होता है।जहां मलबरी सिल्क का उत्पादन दक्षिण भारत मे होता है वही प्रयोग में लाई जाने वाली जरी का उत्पादन गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में किया जाता है।इसकी बुनाई में तीन सटलो का प्रयोग किया जाता है। 

सबसे खास बात जो इसकी बुनाई को बाकी साड़ियों की बनाई से अलग करता है वो ये है कि इसका पाढ़ा और इसके पल्लू दोनो की बुनाई अलग अलग होती है और बाद में इन्हें एक साथ जोड़ दिया जाता है।जिस जगह पर ये जुड़ाई होती है वो अमूमन ज़िग ज़ैग लाइन से दिखाई जाती है।

डीजाइन

कांचीपुरम साड़ी को अलग बनाता है उसका कॉन्ट्रास्ट बॉर्डर। मंदिर (टेम्पल) बॉर्डर का प्रयोग इसकी विविधता को एक नया आयाम देता है।बृहद रूप से गोल्डन जरी का प्रयोग इसे चमकदार और भारी भी बनाता है।

जहां इसके पाढ़ पर चेक(चौखट), स्ट्रिप(धारीदार) और बूटे इसकी शोभा बढ़ाते हैं वहीं इसमें प्रयुक्त होने वाले मंदिरों के डिजाइन और राजा रवि वर्मा की डिजाइनों से प्रेरित इसे अलग बनाते हैं।इसके पल्लू पर महाभारत और रामायण से जुड़ी कथाएं भी दर्शायी जाती हैं।


भगौलिक उपदर्शक

सिल्क साड़ी के मुख्य उत्पादन के लिए ही कांचीपुरम को सिल्क सिटी के नाम से भी जाना जाने लगा है।तथ्यों के अनुसार राजा कृष्ण देव राय जी के ही समय से ही कांचीपुरम अपनी श्रेष्ठ  कारीगरी और साड़ियों के लिए जानी जाती रहीहै।कांचीपुरम साड़ी को 2005 में भारत सरकार द्वारा भगौलिक उपदर्शक (g i) की मान्यता भी तमिलनाडु राज्य को मिल चुकी है।

Saturday, 10 October 2020

जामदानी साड़ी


जामदानी सिल्क से बनी हुई साड़ियां पूरी दुनिया में अपनी कढ़ाई के काम, डिजायन और बारीक मलमल के कपड़े के लिए काफी प्रसिद्ध हैं।जामदानि, बंगाल के सबसे महीन मलमल वस्त्र है।गर्मियों के लिए एक अमूल्य उपहार धरा के बुनकरों द्वारा। बांग्लादेश के नारायणगंज जिले के दक्षिणी रूपसी में जामदानि का उत्पादन होता है,बांग्लादेश की राजधानी के नाम पर इसे ढाकाई जामदानी भी कहते हैं।भारत में बांग्लादेश से सटी सीमाओं में भी इसका निर्माण होता है।


जामदानी मुख्य तौर पर एक पर्शियन शब्द है,ये शब्द दो शब्दों जाम और दानी को मिलाकर बना है। जाम का मतलब है फूल और दानी का मतलब होत है गुलदस्ता। 


इस साड़ी इतिहास इतना पुराना है कि इसका जिक्र ईसा पूर्व के चाणक्य के द्वारा लिखे ग्रंथ अर्थशास्त्र में मिलता है।अरब भूगोलशास्त्री Sulaiman Al Mahri ने भी अपनी किताब ‘Sril Silat-ut-Tawarikh’ में भी जामदानी का ज़िक्र किया है।

अवध के नवाबों के शासन काल में जामदानी ने कलात्मक श्रेष्ठता प्राप्त कर ली थी। जामदानी के उद्भव के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन गुप्तकाल (चौथी से छटी शताब्दी ई.) के संस्कृत साहित्य में इसका उल्लेख है। यह तो ज्ञात है कि मुग़ल काल (1556-1707 ई.) में श्रेष्ठ जामदानियां ढाका, तत्कालीन बंगाल राज्य में वर्तमान बांग्लादेश की राजधानी, में बनाई जाती थी

पारंपरिक तौर पर  इसका निर्माण सिर्फ  पुरुषों द्वारा की जाती है।
हालांकि इंडस्ट्री रेवोल्यूशन के चलते औरतों ने भी इसे बनाना शुरू कर दिया है। जामदानी की पारंपरिक बुनाई अभी भी पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में की जाती है और बांग्लादेश के रूपगंज, सोनारगांव और सिद्धिरगांव में भी जामदानी की बुनाई होती है।

जामदानि को बुनने की कला को यूनेस्को ने 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' घोषित किया है।


Saturday, 26 September 2020

जरदोजी....

ज़रदोज़ी वस्तुतः एक प्रकार की कढ़ाई होती है जो भारत एवं पाकिस्तान में बहुत ही प्रचलित है।ज़रदोज़ी का नाम फारसी से आया है, जिसका मतलब है सोने की कढ़ाई।
जरदोजी एक फारसी शब्द है जिसका संधी विच्छेद जर +दोजी यानी सोने की कढ़ाई। भारत में इसका काल ऋग्वेेेद माना जाता है और कहा जाता है की देवी-देवताओं को सजाने के लिए इस कला का उपयोग होता था हां बाद मेंं ये मुगल काल मे अकबर के शासन के दौरान प्रस्फुटित हुआ परन्तु औरंगजेब के कला के प्रति उदासीनता से कारीगर भारत के अन्य क्षेत्रों मे विस्थापित हो गए।कलाबातुन’ के नाम से जानी जाती इसकी मूल प्रक्रिया के अंतर्गत असली सोने या चांदी में लिपटे रेशम के धागों का उपयोग किया जाता था। 

उपकरण

पहले चर्खे का सहारा ताग को सीधा करने तथा उसे ठीक से प्रयोग की सहूलियत में उपयोग किया जाता था।पुरातन चर्खा लकड़ी एवम बांस की पट्टी से बना होता था,पर  आजकल ये साईकिल के पिछले चक्के के प्रयोग से होता है, चेन, तथा गीयर को भी चरखा बनाकर उससे चरखे का काम लिया जाता है। इसके पिछे का कारण वस्तुतः साईकिल के  रिम का मजबूत होना है जिससे यह ज्यादा दिन तक चलता है, वहीं दूसरा प्रमुख कारण है, इसका पहिया चेन तथा गीयर से लगा होता है अतः यह लकड़ी वाले चर्खा की तुलना में ज्यादा गतिशील हो जाता है जिससे कम समय में ज्यादा से ज्यादा ताग लपेटा जाता है।

बनाने की प्रक्रिया

इसमें मुख्यतः चार प्रमुख चरण शामिल हैं

1.आकृति को एक अनुरेखण पत्र या ट्रेसिंग शीट पर खींचा जाता है, और इन आकृतियों के अनुरूप ही उसे छिद्रित कर दिया जाता है।

2 .उस ट्रेसिंग शीट को कपड़े पर रखा जाता है, और वह आकृति नीचे स्थित कपड़े पर स्थानांतरित करने के लिए उस पर मिट्टी के तेल और रॉबिन ब्ल्यू के घोल को थपथपाया जाता है। 

3. कपड़े को एक लकड़ी या बांस के खांचे में फँसा कर रखा जाता है और इसे अच्छी तरह फैलाया जाता है ताकि हर पंक्ति और आकृति स्पष्ट रूप से दिखाई दे। 

4. अंतिम चरण में ‘एरी’ नामक लकड़ी की छड़ी से जुड़ी सुई जो धागे को कपड़ों के ऊपर और नीचे से गुजर सकती है, की मदद से इस काम को किया जाता है।

 काम में आवश्यक बारीकी के आधार पर, कारीगर एक कपड़े को निपटाने के लिए 1 से 10 दिन तक ले सकते हैं।

पुराने समय में यह यह काम महिलाएं अपने घर में बैठकर हाथ से ही किया करतीं थीं लेकिन अब यह काम मशीनों के द्वारा भी किया जाता है।बहुत ही महीन रूप से इस कार्य को करने के लिये खुले स्थान पर एक लकड़ी का बना हुआ फ्रेम लगाया जाता हैं उसके बाद जिस कपड़े पर ज़री का कार्य किया जाना हैं उस कपड़े को टाँगा जाता हैं फिर उस पर एक विशेष प्रकार की सुई से ज़री की कढ़ाई की जाती है।

ज़री की कढ़ाई के लिये जहां पहले मुख्यत सोने एवं चांदी के धागों का प्रयोग किया जाता है।जो कि काफी महँगे होते हैं और आज जब सोने चांदी का दर मंहगाई के उच्चतम शिखर पर है तो उसकी जगह कृत्रिम धागों का प्रयोग आम हो चला है। यह कृत्रिम धागा चमकीला व पीले-सफ़ेद रंग का होता जो सोने व चाँदी के धागे जैसा लगता है। यह देखने में भी सुन्दर होता है एवं इन धागों के कारण ज़री के काम को करवाने की लागत भी कम आती है।

नीचे की साड़ी में भी पाढ़ और बार्डर में मखमल के ऊपर जरदोजी का काम है, जिसे भाई के तिलक में पहन खूब इठलाई थी।

Saturday, 19 September 2020

रंग बनारसिया

मैं लगभग 5-6 वर्ष की थी,जब चाची के खुले पेटी से होते मेरी सरसराती नजर उस पिले बनारसी पर पड़ी थी। शायद इश्क का वो मयस्सर लव एट फर्स्ट साइट उसे ही कहते हैं।पीली हल्की बनारसी साड़ी।चाची की बियहुति साड़ी(वो साड़ी जो दूल्हे कर घर से दुल्हन के लिए आती है, और व्याह उसी साड़ी को पहना होती है।मुझे वो साड़ी बहुत पसंद थी,पर समय और देख रेख के अभाव से वो खराब हो गई थी और इस तरह एक टूटे दिल के साथ चल पड़ा था साड़ियों से इश्क का सिलसिला जो अब तलक जारी है।

जैसे आम फलों का राजा और गुलाब फूलों की रानी वैसे ही साड़ियों में कोई है तो वो बनारसी ही है, इसके क्या कहने।

रानियों से लेकर अभिनेत्रियों और हमारी पुरखों की औरतों से लेकर हम युवा पीढ़ी तक, कोई भी इसके जादू से अछूता नही है। 

रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग ज़री के डिजाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली विश्व प्रसिद्ध  सुंदर रेशमी साड़ी को ही बनारसी रेशमी साड़ी कहते हैं।

इनमें अनेक प्रकार के नमूने बनाये जाते हैं। इन्हें 'मोटिफ' कहते हैं।उन्ही में से कुछ प्रमुख परम्परागत मोटिफ हैं जो आज भी अपनी बनारसी पहचान बनाए हुए हैं।

 "बूटा" मोटिफ

जब बूटी की आकृति को बड़ा कर दिया जाता है तो इस बढ़ी हुई आकृति को बूटा कहा जाता है। छोटे बड़े पेड़-पौधे जिसके साथ छोटी-छोटी पत्तियाँ तथा फूल लगे हों इसी आकृति को बूटे से उभारा जाता है। यह पेड़ पौधे भी हो सकते हैं और कुछ फूल भी हो सकते हैं। गोल्ड, सिल्वर या रेशमी धागे या इनके मिश्रण से बूटा काढ़ा जाता है। रंगों का चयन डिज़ाइन तथा आवश्यकता के अनुसार किया जाता है। बूटा साड़ी के बॉर्डर, पल्लु तथा आंचल में काढ़ा जाता है।



 "बूटी" मोटिफ

बूटी छोटे-छोटे तस्वीरों की आकृति लिए हुए होता है। इसके अलग-अलग पैटर्न दो या तीन रंगो के धागे की सहायता से बनाये जाते हैं।इससे साड़ी की जमीन या मुख्य भाग को सुसज्जित किया जाता है। पहले रंग को 'हुनर का रंग ' कहा जाता है। जो सामान्यतः गोल्ड या सिल्वर धागे से बनाया जाता था हालाँकि आजकल इसके  महंगे होने के कारण गोल्ड और सिल्वर के धागे की जगह रेशमी धागों का भी प्रयोग किया जाता है।


"जाल" मोटिफ

बनारसी साड़ी का एक और प्रचलित मोटिफ है "जाल", नाम के अनुरूप ही जाल के आकृति लिए हुए होते हैं। जाल एक प्रकार का पैटर्न है, जिसके भीतर बूटी बनाई जाती है और इसे जाल- जंगला कहते हैं। जंगला डिज़ाइन प्राकृतिक तत्वों से काफी प्रभावित है। जिसमें समस्त फूल, पत्ते, जानवर, पक्षी इत्यादि बने होते हैं। 

बॉर्डर के तुरंत बाद जहाँ कपड़े का मुख्य भाग जिसे अंगना कहा जाता है की शुरुआत होती है वहाँ एक खास डिज़ाइन वस्त्र को और अधिक अलंकृत करने के लिए दिया जाता है, जिसे झालर कहा जाता है। 


यूँ तो यह सिल्क और गाढ़े कपड़े की वजह से ऋतुओं के अनुसार ये शीत ऋतु के लिए उपयुक्त है, पर अपनी राजसी ठाठ की वजह से इसकी उपयोगिता हर महत्वपूर्ण   रिवाज और हर ऋतु में है।चाहे वो यूपी,बिहार के किसी गाँव की हो या दक्षिणी प्रान्त की शायद ही कोई बधू होगी जिसका सुहाग पिटारा इससे सुशोभित न हो।

Friday, 11 September 2020

घरचोला साड़ी


सन 2002,30 अप्रैल मेरी मुहबोली मौसी अपनी शादी में एक लाल साड़ी में बिल्कुल गुड़िया सी सजी धजी बैठी हुई।जाने ये उस माहौल का प्रभाव था या उस साड़ी का।साड़ी थी गुजरात की प्रसिद्ध घरचोला!

घरचोला मूलतः दो शब्दों से बना है, घर + चोला अर्थात घर मे पहने जाने वाला कपड़ा। इसका जो एक और अर्थ है वो वास्तव में काफी गूढ़ है, घरचोला यहाँ घर का अर्थ होता है दुल्हन का नया घर अर्थात उसका ससुराल और चोला यानी वहाँ से आने वाला शादी के लिए दुल्हन का कपड़ा।

 घरचोला का मूल 
घरचोला साड़ी का मूल गुजरात के खम्बात की खाड़ी से सम्बंधित है।16 वीं सदी के अंत तक खम्बात देश का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था और सम्पूर्ण विश्व के व्यापारी वहां से व्यवसाय करते थे,उन्ही में से कुछ थे सिल्क के उत्पादन वाले देश के और यही से कहानी शुरू हुई घरचोला साड़ियों के उत्पादन की।
घरचोला साड़ी के दो महत्वपूर्ण अंग है एक तो इसकी बुनाई दूसरी इसकी रंगाई।मूल रूप से इसकी रंगाई गुजरात के जामनगर में  होती है,एक अवधारणा यह भी है कि घरचोला के मूल रंग लाल वहां के पानी से और सुर्ख खिलता है।

घरचोला का उत्पादन
 घरचोला का उत्पादन मूल रूप से गुजरात के खम्बात में होती है खासकर इसकी रंगाई जामनगर में की जाती है।सूरत,राजकोट और सुरेन्द्र नगर जिले में भी इसका उत्पादन होता है। किंतु सौराष्ट्र और बाकी विभिन्न जिले में उत्पादित होने वाली घरचोला बाकियो से अलग होती है।




दक्षिण से पश्चिम का संगम
वस्तुतः ये एक भ्रांति ही है घरचोला साड़ी हमेशा शुद्ध सिल्क से ही बनता है।जबकि प्रमाणित रूप से शुद्ध घरचोला साड़ियों का निर्माण आंशिक रूप (यदाकदा) रूप से ही सिल्क पर होती है।मूल रूप से इसमें जो पटल प्रयोग में लाया जाता है वो होती है वेंकटागिरी सूती।जिसकी चमक और रूप कुछ सिल्क जैसा ही होता है।ये वेंकटागिरी सूती उत्पादित होता है गुजरात से सुदूर दक्षिणी भारत विशेषकर आंध्र प्रदेश में और इस तरह ये मापता है एक पूरी दूरी दक्षिण से पश्चिम की ओर।

जरी
घरचोला साड़ियों का मुख्य आकर्षण होता है उसमें प्रयोग होने वाली जरियां जो मुख्य रूप से सोने के धागों से बनी होती थी, अब उनकी जगह चांदियों के धागों का भी उपयोग होता है।चांदियो के मूल्य वर्धन से याब कॉपर और प्लास्टिक के जरी का भी उपयोग होने लगा है जो इन घरचोला साड़ियों को सस्ती और सुलभ बनाती हैं।
इन गोल्डन जरीयों को इस तरह से सूती या सिल्क के धागों के साथ बुना जाता है कि वो एक चौकोर ग्रिड डिजाइन में बुनते हैं।ग्रिड का हर बॉक्स चारो तरफ से एक जरी बॉर्डर सा बनता है,जो कि पतला या मोटा हो सकता है अपने डिज़ाइन के अनुरूप।


जरी के ये चौकौर ग्रिड अलग अलग पैटर्न में बने होते हैं जिनमे से प्रमुख होते हैं 9,12 और 52 स्क्वायर पैटर्न।इन पैटर्न के नाम पर ही इनका नामकरण भी होता है जैसे कि 12 स्क्वायर वाले को बार भाग और 52 स्क्वायर वाले को बावन भाग।
घरचोला के इन सारे चौकौर खाने को बंधेज के अलग अलग पैटर्न में रंगा जाता है अक्सर एक ही जैसे बंधेज हर खाने में उपयोग होता है या उनको स्ट्रेटेजिक तरीके से उपयोग में लाया जाता है।

रंग और मोटिफ
ज्यादातर घरचोला लाल या उसके आसपास के रंगों में ही बनते हैं क्योंकि गुजरात के हिंदुओं और जैनियों के बीच ही इस साड़ी का ज्यादा प्रयोग होता है जो इस रंग को काफी पवित्र मानते हैं।
दूसरा जो सबसे ज्यादा प्रयुक्त होने वाला रंग है वो है हरा! हरा रंग वंश की बढ़ोतरी का द्दौतक है।
तीसरा रंग पीला है जो खुद में बहुत पवित्र होता है।

घरचोला साड़ी को और भी सुंदर बनाया जाता है विभिन्न धागों की हस्तकारी से जिसमे कट डायमंड और गोटा पट्टी का भी इस्तेमाल होता है।चौकोर ग्रिड में हाथ से बनाये मोटिफ में साकार रूप लेते हैं भिन्न प्रकार की आकृतियां जैसे कि कमल,तोता,चिड़ियाँ,मोर,हाथी इत्यादि।वही पल्लू पर बने डिजाइन में प्रमुखता से उपयोग होता है।
फूलवारी - जिसके मोटिफ होते हैं,पेड़ पौधे और फूल।
शिकारी - जिसके मोटिफ में प्रयोग होते हैं,जंगल और शिकारी।

विजया शर्मा