इतिहास
चंदेरी साड़ी का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना है माना जाता है कि करीब 20 हजार बुनकर मौलाना मजीबुद्दीन उलूफ के अनुयाई के रूप में बंगाल के लखनौती (ढाका) से, जिसे बुनाई का गढ़ माना जाता था, विस्थापित होकर चंदेरी आए थे। इन्होंने चन्देरी में बुनाई का काम शुरू किया।
चंदेरी की साड़ियां राजा-महराजा के जमाने से परंपरागत रूप में चली आ रही हैं।सबसे पहले राजाओं के लिए सूत से पगडिंयां बनाया जाता था।बाद में उनकी रानियों के कहने पर सूत से साड़ीयां बनाई गई। फिर बाद में इसमें रेशम से काम शुरू हुआ।
बुनाई
सिर्फ चन्देरी में बन सकती हैं दरअसल चंदेरी की खास जलवायु के कारण इस तरह की साड़ी का निर्माण सिर्फ वहीं हो सकता है, अन्यत्र नहीं।कहते हैं पहले सिर्फ सफेद साड़ीयां ही बनती थी बाद में यह अन्य रंगों में आने लगी।अब इन साड़ियों की रंगाई एवं बुनाई दोनो हीं चंदेरी में होती हैं।किंतु आज भी कच्चा माल जैसे कि रेशम एवं रंग बाहर से ही आते हैं।
चंदेरी साड़ी की खासियत उसे तैयार करने में है। यह पूरी तरह हैंडमेड होती हैं। इसे बनाने में पावरलूम यानी मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता है। सालों पहले ट्रांसपेरेंट कॉटन या मलमल की साड़ी बनाई जाती थी। यह ट्रेंड आज भी बरकरार है लेकिन अब सिल्क के रेशमी धागों की चंदेरी साड़ी भी बनाई जाती है।फिलवक्त यह साड़ी प्योर सिल्क, प्योर कॉटन और कॉटन प्लस सिल्क जैसे फैब्रिक में बनती है।
मंहगाई
चंदेरी से साड़ियां बुनी जरूर जाती हैं लेकिन पूरा कच्चा माल बाहर से आता है। क्वाइल वाला रेशम चीन या जापान या कोरिया से आता है( पर जापान एवं कोरिया की सुत कच्ची होती है जो बाने पर कसने से टूट जाती है),जरी सूरत से आती है।बाना!जिससे बुनाई होती है वो कोयंबटूर या मुंबई से आता है।
इसकी अधिक कीमत की एक और वजह यह है कि इसके निर्माण में धागे, कपड़ा इत्यादि ऑरिजिनल होते हैं। साथ ही, बुनाई सधे हाथ से बहुत ही बारीकी से की जाती है। एक साड़ी को तैयार करने में कई बुनकरों को कई दिन मेहनत करनी पड़ती है।
इससे तैयार साड़ियां अपने विश्व स्तरीय पहचान बनाने में कामयाब रही। किंतु फिर भी वो सिर्फ राजघराने एवं धनाढ्य परिवारों तक हीं सीमित रहीं।बाद में मध्य प्रदेश सरकार ने चन्देरी साड़ियों को आमजन तक पहुंचाने की योजना बनाई। तब चन्देरी उत्पादों को सरकारी प्रोत्साहन मिला और इस साड़ी की कुछ डिजाइन आमजन तक पहुंच वाली भी बनने लगी
बुनकर
चंदेरी में दो तरह के बुनकर और कारोबारी हैं। पहले जो सिर्फ बुनकर जो अपने घरों में 2-3 हैंडलूम लगाते हैं। दूसरे हैं मास्टर बुनकर इन्हें मध्यम वर्ग का कारोबारी कह सकते हैं, इनके पास 50 से 100 हैंडलूप में हैं, इनके पास कई-कई लाख का माल स्टॉक रहता था, ये मांग पर साड़ियां बुनवाते
साल 2011 की जनगणना के अनुसार 33,081 जनसंख्या वाले चंदेरी में 6 हजार से अधिक हैण्डलूम लगे हैं, इन पर लगभग 15,000 लोग काम करके अपनी आजीविका चला रहे हैं। सरकार ने चंदेरी को बढ़ाने के लिए यहां हैंडलूम पार्क भी खोला है,जहां समूह बनाकर बुनाई होती है, हैंडलूम मार्क में लगभग 250 लूम लगे हैं, लेकिन ज्यादातर बंद ही हैं।
विशेष
कालांतर में चन्देरी में साड़ियों के अलावा दुपट्टे और सलवार सूट भी बनने लगे। कई फिल्मों एवं सीरियलों में भी चन्देरी साड़ियों और दुपट्टों का प्रयोग हुआ है।
कहते हैं पहले पहले फ़िल्म पकीजा, जिसमें मीनाकुमारी जी पर जो गाना फिल्माया गया था.....
" इन्ही लोगों ने लै लीना दुप्टटा मेरा......"
वो दुप्पटा चंदेरी का हीं था
विजया।