पौराणिक कथाओं के अनुसार कांचीपुरम साड़ी के बुनकरों को महर्षि मार्कण्डेय जी का वंशज माना गया है जो कमल के फूल के रेशों से देवताओं के लिए परिधान बुनते थे।
बुनाई
कांचीपुरम साड़ी की बनाई शुद्ध मलबरी सिल्क के धागों से होता है।जहां मलबरी सिल्क का उत्पादन दक्षिण भारत मे होता है वही प्रयोग में लाई जाने वाली जरी का उत्पादन गुजरात जैसे पश्चिमी राज्यों में किया जाता है।इसकी बुनाई में तीन सटलो का प्रयोग किया जाता है।
सबसे खास बात जो इसकी बुनाई को बाकी साड़ियों की बनाई से अलग करता है वो ये है कि इसका पाढ़ा और इसके पल्लू दोनो की बुनाई अलग अलग होती है और बाद में इन्हें एक साथ जोड़ दिया जाता है।जिस जगह पर ये जुड़ाई होती है वो अमूमन ज़िग ज़ैग लाइन से दिखाई जाती है।
डीजाइन
कांचीपुरम साड़ी को अलग बनाता है उसका कॉन्ट्रास्ट बॉर्डर। मंदिर (टेम्पल) बॉर्डर का प्रयोग इसकी विविधता को एक नया आयाम देता है।बृहद रूप से गोल्डन जरी का प्रयोग इसे चमकदार और भारी भी बनाता है।
जहां इसके पाढ़ पर चेक(चौखट), स्ट्रिप(धारीदार) और बूटे इसकी शोभा बढ़ाते हैं वहीं इसमें प्रयुक्त होने वाले मंदिरों के डिजाइन और राजा रवि वर्मा की डिजाइनों से प्रेरित इसे अलग बनाते हैं।इसके पल्लू पर महाभारत और रामायण से जुड़ी कथाएं भी दर्शायी जाती हैं।
भगौलिक उपदर्शक
सिल्क साड़ी के मुख्य उत्पादन के लिए ही कांचीपुरम को सिल्क सिटी के नाम से भी जाना जाने लगा है।तथ्यों के अनुसार राजा कृष्ण देव राय जी के ही समय से ही कांचीपुरम अपनी श्रेष्ठ कारीगरी और साड़ियों के लिए जानी जाती रहीहै।कांचीपुरम साड़ी को 2005 में भारत सरकार द्वारा भगौलिक उपदर्शक (g i) की मान्यता भी तमिलनाडु राज्य को मिल चुकी है।